दो और तीन दिसंबर 1984 ,मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के लोगो के लिए एक भयावह और काली रात साबित हुई थी:भोपाल गैस त्रासदी

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दो और तीन दिसंबर 1984, मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के लोगो के लिए एक भयावह और काली रात साबित हुई थी

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दो और तीन दिसंबर 1984  को मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में सब लोग सुकून से सो रहे थे. लेकिन जैसे ही उजाला हुआ तब एहसास हुआ कि सो रहे लोग लाशों में तब्दील हो गए हैं. 1984 की उस रात को यूनियन कार्बाइड की फैक्टरी के प्लांट नंबर ‘सी’ के टैंक नंबर 610 में भरी जहरीली मिथाइल आइसोसाइनेट गैस में पानी भर गया. कैमिकल रिएक्शन से बने दबाव को टैंक सह नहीं पाया और वो खुल गया. इससे जहरीली गैस का रिसाव होने लगा. हवा के साथ ये गैस पूरे इलाके में फैल गया और आंखें खुलने से पहले ही हजारों लोग मौत की नींद मे सो गए.लोग कहते है की कारखाने का अलार्म सिस्टम भी घंटों तक बेअसर रहा था, जिससे लोगों को समय रहते चेतावनी नहीं पहुची.

कारखाने के पास बसी झुग्गियों में रह रहे मजदूर इस जहरीली गैस के सबसे पहले शिकार बने| फैक्टरी के पास होने के कारण उन लोगों की मौत सबसे पहले हुई थी. हादसे के बाद हुई जांच में ये बात सामने आई थी कि लोगों को मौत की नींद सुलाने में यूनियन कार्बाइड फैक्टरी से निकली विषैली गैस को औसत तीन मिनट लगे.सुबह होने पर बड़ी संख्या में लोग आंखों में और सीने में जलन की परेशानी को लेकर अस्पताल पहुंचने लगे थे. देखते ही देखते संख्या इतनी हो गई थी कि अस्पताल में जगह नहीं बची. इसकी वजह की पड़ताल करने पर यूनियन कार्बाइड फैक्टरी में हुए रिसाव के बारे में पता चला था.

मरने वालों की संख्या कितनी थी इसे लेकर आज तक सही आंकड़े सामने नहीं आ सके हैं. हालांकि, सरकार आंकड़ों के मुताबिक जहरीली गैस से करीब 3000 लोगों की जान ली थी. वहीं कुछ का अनुमान बताते हैं कि 8000 से 10000 लोगों की मौत तो दो सप्ताहों के अंदर हो गई थी, इसके बाद भी मौत का सिलसिला जारी रहा था.2006 में प्रदेश सरकार के एक शपथ पत्र में माना गया कि भोपाल के लगभग 5 लाख 20 हजार लोग इस जहरीली गैस से सीधी रूप से प्रभावित हुई थी. जिसमें 2,00,000 लोग 15 साल की उम्र से कम और 3,000 गर्भवती महिलाएं थीं. आंशिक रूप से प्रभावित होने वाले लोगों की संख्या लगभग 38,478 थी. 3900 तो बुरी तरह प्रभावित और पूरी तरह अपंगता के शिकार हो गए थे.माना जाता है कि रिसाव की घटना के बाद गैस का असर करीब आठ घंटे बाद खत्म हो गया था. लेकिन ये घंटे हजारों लोगों की जान लेने के लिए काफी थे. इस गैस का प्रभाव से अब तक शहर उबर नहीं पाया है.

गैस कांड में लोगों की मौत का जिम्मेदार यूनियन कार्बाइड फैक्टरी के मालिक वारेन एंडरसन को माना गया था. लेकिन उस पर कोई कार्रवाई हो सके इससे पहले ही वो भारत से भाग निकलने में कामयाब हो गया था. माना जाता है कि उस समय के राज्य और केंद्र सरकार ने उसे भागने मे मदद की थी|

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