पोप फ्रांसिस पहुंचे बांग्लादेश, उठा सकते रोहिंग्या का मुद्दा

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रोहिंग्या संकट गहराने के बीच पोप की यह यात्रा हो रही है. पोप ने रोहिंग्या लोगों के उत्पीड़न की निंदा की है. हालांकि, म्यांमार यात्रा के दौरान उन्होंने सार्वजनिक रूप से ‘रोहिंग्या’ शब्द का इस्तेमाल नहीं किया.

बांग्लादेश: पोप फ्रांसिस मुस्लिम बहुल देश बांग्लादेश की ऐतिहासिक यात्रा पर गुरुवार (30 नवंबर) को यहां पहुंचे. उनकी यात्रा के दौरान म्यांमार के रोहिंग्या शरणार्थियों के मुद्दे प्रमुखता से उठने की संभावना है. पोप का यहां भव्य स्वागत किया गया. 80 वर्षीय पोप म्यांमार की यात्रा संपन्न कर एक विशेष विमान से तीन दिन की यात्रा पर बांग्लादेश पहुंचे हैं. म्यांमार में उन्होंने संदेश दिया कि न्याय एवं मानवाधिकार शांति की आधारशिला हैं. उन्होंने रोहिंग्या संकट की ओर इशारा करते हुए यह बात कही. राष्ट्रपति अब्दुल हामिद ने ढाका के हजरत शाहजलाल अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डा पर पोप की अगवानी की. बांग्लादेश सशस्त्र बलों की एक टुकड़ी ने उन्हें ‘गार्ड ऑफ ऑनर’ दिया. पोप के लिए सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है.

रोहिंग्या संकट गहराने के बीच पोप की यह यात्रा हो रही है. पोप ने रोहिंग्या लोगों के उत्पीड़न की निंदा की है. हालांकि, म्यांमार यात्रा के दौरान उन्होंने सार्वजनिक रूप से ‘रोहिंग्या’ शब्द का इस्तेमाल नहीं करने को प्राथमिकता दी. इसे लेकर उन्हें आलोचनाओं का सामना करना पड़ा है. वहीं, वेटिकन ने उनकी चुप्पी का बचाव करते हुए कहा कि पोप बौद्ध मतावलंबी बहुल देश के साथ संपर्क कायम करना चाहते हैं. गौरतलब है कि करीब 620,000 रोहिंग्या मुस्लिम सेना की कार्रवाई से बचने के लिए अगस्त से म्यांमार के राखिन प्रांत से पलायन करके बांग्लादेश पहुंचे हैं. पोप फ्रांसिस से पहले पोप जॉन पॉल 2 ने 1986 में बांग्लादेश की यात्रा की थी.

इससे पहले पोप फ्रांसिस ने मंगलवार (28 नवंबर) को म्यांमार में बहुप्रतीक्षित संबोधन में अधिकारों और न्याय के लिए सम्मान का आह्वान किया, लेकिन उन्होंने रोहिंग्या या जातीय सफाये के आरोपों का कोई जिक्र नहीं किया. इस कथित जातीय सफाये से देश के मुस्लिम अल्पसंख्यक बड़ी संख्या में देश से विस्थापित हुए हैं. राजधानी ने पी ताव में म्यांमार की नेता आंग सान सू ची के साथ मंच साझा करते हुए उन्होंने रोहिंग्या संकट का कोई जिक्र नहीं किया. उन्होंने अपने भाषण में कहा कि शांति केवल ‘‘न्याय एवं मानवाधिकार के लिए सम्मान’’ के जरिये ही हासिल की जा सकती है. उन्होंने ‘‘हर जातीय समूह और इसकी पहचान के सम्मान’’ का भी आह्वान किया. फ्रांसिस गुरुवार (30 नवंबर) को बांग्लादेश जाएंगे. सू ची ने अपने संबोधन में देश के सामने मौजूद चुनौतियों का जिक्र किया लेकिन उन्होंने भी ‘रोहिंग्या’ की कोई बात नहीं की.

Ref:- zeenews.india.com

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